लखनऊ का रोमांस |

लखनऊ में रोमांस किसी फिल्मी गाने की तरह नहीं होता।


यहाँ प्यार तेज़ आवाज़ में नहीं आता। वह धीरे-धीरे बातचीत में उतरता है, शामों में ठहरता है और फिर दिल में अपनी जगह बना लेता है।


कहते हैं इस शहर में मोहब्बत की शुरुआत अक्सर किसी छोटी सी मुलाकात से होती है।


यह कहानी भी ऐसी ही थी।


अनुष्का लखनऊ में रहती थी।


वह एक प्रकाशन संस्था में काम करती थी और किताबों के बीच उसका दिन गुजरता था। उसे शांत जगहें पसंद थीं। दोस्तों की भीड़ से ज़्यादा उसे अकेले बैठकर लोगों को देखना अच्छा लगता था।


उसका मानना था कि रोमांस सिर्फ कहानियों में अच्छा लगता है।


असल ज़िंदगी में लोग जल्दी बदल जाते हैं।


एक सर्द शाम वह काम खत्म करके बाहर निकली।


हल्की हवा चल रही थी।


उसने सोचा थोड़ी देर टहल लिया जाए।


चलते-चलते वह एक छोटे से पुराने कैफे में चली गई।


वहाँ भीड़ कम थी।


उसने कॉफी ऑर्डर की और खिड़की के पास बैठ गई।


कुछ देर बाद एक आवाज़ आई—


अगर आपको बुरा न लगे तो क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? बाकी सारी सीटें भरी हैं।”


अनुष्का ने ऊपर देखा।


एक लड़का था।


चेहरे पर सादगी।


हाथ में नोटबुक।


उसने सिर हिलाकर हाँ कर दी।


कुछ मिनट दोनों चुप रहे।


फिर लड़के ने पूछा—


“आप किताब पढ़ रही हैं या लोगों को देख रही हैं?”


अनुष्का हल्का मुस्कुराई।


“दोनों।”


वह हँसा।


“अच्छा जवाब है।”


उसने अपना नाम बताया—अद्वैत।


वह शहर पर लेख लिखता था और नई जगहों पर बैठकर लोगों को देखना उसे पसंद था।


बात शुरू हुई।


फिर चलती गई।


पहले किताबों पर।


फिर शहर पर।


फिर इस बात पर कि लोग क्यों बदल जाते हैं।


जाते समय अद्वैत बोला—


“अगर अगली बार मिले तो मैं आपको अपनी पसंदीदा चाय पिलाऊँगा।”


अनुष्का मुस्कुराकर चली गई।


उसने सोचा—


ऐसी बातें लोग कहते रहते हैं।


लेकिन अगले दिन—


वह फिर वहीं था।


और उसके सामने पहले से दो कप चाय रखे थे।


वह बोला—


“मैंने सोचा शायद आप आएँ।”


अनुष्का बैठ गई।


उस दिन बातें ज़्यादा हुईं।


फिर मुलाकातें बढ़ने लगीं।


अब शामें तय होने लगीं।


कभी कैफे।


कभी शहर की सड़कें।


कभी बिना वजह लंबी सैर।


अद्वैत की एक आदत थी—


वह छोटी बातें याद रखता।


अनुष्का को कम चीनी पसंद है।


वह सोचते समय खिड़की के बाहर देखती है।


और उसे बारिश की आवाज़ अच्छी लगती है।


एक दिन दोनों शाम को टहल रहे थे।


आसमान हल्का गुलाबी था।


अद्वैत ने पूछा—


“तुम्हें रोमांस पर भरोसा नहीं है?”


अनुष्का ने कहा—


“शायद नहीं।”


“क्यों?”


वह कुछ देर चुप रही।


फिर बोली—


“क्योंकि लोग शुरुआत में बहुत अच्छे लगते हैं।”


अद्वैत मुस्कुराया नहीं।


उसने धीरे से कहा—


“और अगर कोई आखिर तक वैसा ही रहे?”


अनुष्का ने जवाब नहीं दिया।


लेकिन उस सवाल ने उसके भीतर कुछ बदल दिया।


दिन गुजरते गए।


अब अगर किसी दिन मुलाकात न हो तो शाम अधूरी लगती।


अगर मैसेज देर से आए तो इंतज़ार होता।


एक दिन बारिश शुरू हो गई।


दोनों सड़क किनारे एक शेड के नीचे खड़े थे।


अद्वैत ने अपना जैकेट उसकी तरफ बढ़ा दिया।


अनुष्का ने कहा—


“तुम हमेशा इतने ध्यान से क्यों रहते हो?”


वह हँस पड़ा।


“क्योंकि कुछ लोग ध्यान देने लायक होते हैं।”


अनुष्का पहली बार कुछ नहीं बोल पाई।


उस रात उसने देर तक नींद नहीं ली।


कुछ समय बाद अद्वैत को दूसरे शहर में काम मिल गया।


उसे जाना था।


जाने वाली शाम दोनों फिर उसी कैफे में मिले।


आज कॉफी जल्दी खत्म हो गई।


बातें कम थीं।


अद्वैत ने पूछा—


“अगर मैं चला गया तो क्या यह सब खत्म हो जाएगा?”


अनुष्का ने खिड़की के बाहर देखा।


फिर बोली—


“अगर कोई सिर्फ आदत हो तो खत्म हो जाता है।”


वह मुस्कुराया।


“और अगर?”


अनुष्का उसकी तरफ देखकर बोली—


“अगर दिल का हिस्सा बन जाए… तो नहीं।”


कुछ सेकंड खामोशी रही।


फिर दोनों हँस पड़े।


अद्वैत चला गया।


समय बीतता रहा।


लेकिन एक शाम—


अनुष्का उसी कैफे में बैठी थी।


तभी सामने किसी ने दो कप चाय रखी।


वही आवाज़—


“आज भी कम चीनी।”


वह मुस्कुराई।


अद्वैत वापस आ गया था।


उसने पूछा—


“क्यों आए?”


अद्वैत ने जवाब दिया—


“क्योंकि समझ आया… कुछ शहर और कुछ लोग छोड़ने के लिए नहीं होते।”


शाम धीरे-धीरे रात में बदल गई।


और अनुष्का को पहली बार महसूस हुआ—


रोमांस फूलों या बड़े इज़हार में नहीं होता।


वह किसी के याद रखने में होता है।


इंतज़ार करने में होता है।


और लखनऊ में—


वह हमेशा दिल से होता है।


यही था—


लखनऊ का रोमांस।

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